नेमवि में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी प्रारम्भ , तुलसी ने साहित्य एवं जीवन शैली से सनातन संस्कृति को जीवन्त किया: हरगोविन्द कुशवाहा गोस्वामी तुलसीदास युग चेतना के प्रवर्तक कवि थेः प्राचार्य ओमप्रकाश शास्त्री

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ललितपुर:- अखिल भारतीय साहित्य परिषद उत्तर प्रदेश एवं नेहरू महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में संस्कृत सभागार में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र का शुभारम्भ उ.प्र. के दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री एवं अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध संस्थान के उपाध्यक्ष हरगोविंद कुशवाहा, कार्यक्रम अध्यक्ष प्रो. ओम प्रकाश शास्त्री प्राचार्य नेहरू महाविद्यालय ललितपुर ने संयुक्त रूप से मां सरस्वती पूजन एवं दीप प्रज्ज्वलन करके किया।

संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए मुख्य अतिथि उ.प्र. के दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री एवं अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध संस्थान के उपाध्यक्ष हरगोविंद कुशवाहा ने में कहा कि तुलसी लोकदर्शी कवि थे। उनके द्वारा न केवल भक्तों के लिए अपितु लोक कल्याण का भी ध्यान रखा गया। उनका हृदय लोकमंगलकारी भावना से परिपूर्ण था यही कारण है कि उनके द्वारा रचित मानस जन-जन का कंठहार बन गया। उन्होंने रामचरित मानस की पवित्र चौपाइयों के माध्यम से भारत की एकता एवं अखंडता के दर्शन की प्रासंगिकता को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि कवि तुलसी ने अपने साहित्य एवं जीवन शैली से सनातन संस्कृति को जीवन्त किया। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति सत्यम शिवम और सुंदरम पर आधारित है, जिसकी परिकल्पना रामचरितमानस में समाहित है। तुलसीदास जीवन के दुख दर्द की पीड़ा के मर्म से परिचित थे। जीवन में स्वीकृत मूल्योें एवं परंपराओं के प्रति तुलसी में अगाद्ध श्रद्धा है। वे भारतीय मनीषा एवं सार्वभौम मूल्य के अद्वितीय प्रस्तोता है। उन्होंने कहा कि रामचरितमानस तत्कालीन समाज का दर्पण और भारत का एक सांस्कृतिक दस्तावेज है।

कार्यक्रम के अध्यक्ष नेमवि के प्राचार्य प्रो. ओमप्रकाश शास्त्री ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास युग चेतना के प्रवर्तक कवि थे। उनका साहित्य भारत की एकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने अपनी प्रमुख कृति रामचरित मानस के माध्यम से ज्ञान, भक्ति और वैराग्य के साथ ही विभिन्न संस्कृतियों को एक साथ लाने का कार्य किया है। तुलसीदास ने अपने साहित्य के माध्यम से सामाजिक समरसता, भक्ति और नैतिकता जैसे मूल्यों को बढ़ावा दिया है, जिससे समाज, एकता की भावना मजबूत होती है। भगवान राम की भक्ति सभी के लिए सुलभ है चाहे उसकी जाति, वर्ण कुछ भी हो। उनके ग्रंथों ने भारतीय समाज में एकता सद्भाव और भाईचारे की भावना को मजबूत किया है।

विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर आनंद प्रकाश त्रिपाठी पूर्व विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग हरी सिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर ने कहा देश में ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में राम का चरित्र एक विश्व व्यापी चरित्र है। तुलसी में राम है, राम में तुलसी है। तुलसी ने राम कथा के माध्यम से देश के सभी विधाओं का एक सटीक चित्रण किया है। आज देश में जो भी समस्याएं हैं उन सभी समस्याओं का निदान रामचरितमानस के अध्ययन से हल हो सकता है। भारत एक ऐसा देश है जिसमें भावनात्मक एकता है, लेकिन जब हम धर्म, संप्रदाय, जाति, भाषा एवं प्रांत के लिए लड़ते हैं तो भावनात्मक एकता का पक्ष कमजोर होता है। हमें राम के आदर्श और उनके संकल्प को आत्मसात करना होगा तभी सही मायने में आज का दिन साकार हो सकता है एवं तुलसी की परिकल्पना रामराज्य का सपना पूर्ण हो सकता है

मुख्य वक्ता के रूप में डॉक्टर शशि कुमार सिंह, सह आचार्य संस्कृत विभाग हरि सिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर ने कहा कि आज के वैज्ञानिक युग में तुलसीदास जैसे कवि का आध्यात्मिक दृष्टिकोण जनमानस के जीवन को बदल सकता है। तुलसीदास संस्कृत के प्रकांड विद्वान और पंडित थे। भारतीय सभ्यता और संस्कृति का जो प्रभाव तुलसीदास के एक ग्रंथ रामचरितमानस से होता है वैसा विश्व का कोई भी ग्रंथ उत्पन्न नहीं कर सका। मानस एक ऐसा ग्रंथ है जिस पर चलकर प्रत्येक भारतीय अपनी संस्कृति एवं विरासत को संरक्षित कर सकते हैं।

प्रो. आशा साहू ने कहा कि संत तुलसी ने बुन्देलखण्ड की पावन भूमि पर जन्म लेकर सम्पूर्ण विश्व को ज्ञान, भक्ति, उपासना का संदेश देकर भगवान श्रीराम के चरित्र को जन-जन तक सम्प्रेषित किया।

प्रवर्तन करते हुए डॉ सुधाकर उपाध्याय सहायक आचार्य हिंदी ने कहा कि तुलसी का संपूर्ण साहित्य तीन बिंदुओं पर आधारित है, समन्यवाद, लोकमंगल की भावना एवं रामराज्य की परिकल्पना। उन्होंने कहा कि रामचरितमानस के ऐसा दस्तावेज है जिसको आत्मसात करने व्यक्ति शील की ओर प्रवृत्त होता है, सन्मार्ग पर पैर रखता है, विपत्ति में धैर्य धारण करता है और मानव जीवन के महत्व का अनुभव करता है। जो नर से नारायण बनने की दिशा में सन्मार्ग दिखता है।

राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रो. आशा साहू, प्रो. अनिल सूर्यवंशी, हिमांश धर द्विवेदी, डाॅ. सुधाकर उपाध्याय, डाॅ. अरिमर्दन सिंह, डाॅ. प्रीति सिरोठिया ने भारत की एकता एवं अखण्डता में तुलसी साहित्य का योगदान विषय पर सारगर्भित शोध पत्र प्रस्तुत किया। इस अवसर पर डाॅ. रेनू शर्मा बु.वि. झाॅंसी, डाॅ. सूबेदार यादव, डाॅ. सुभाष जैन, डाॅ. दीपक पाठक, डाॅ. रामकुमार रिछारिया, डाॅ. संजीव शर्मा, डाॅ. रोहित जैन, डाॅ. ओ.पी.चैधरी, डाॅ. जितेन्द्र राजपूत, डाॅ. राजेश तिवारी, डाॅ. अनूप दीक्षित, डाॅ. विनोद कुमार, डाॅ. एच.सी.दीक्षित, डाॅ. लक्ष्मीकांत मिश्रा, डाॅ. अरिमर्दन सिंह, डाॅ. अवनीश त्रिपाठी, डाॅ. जगत कौशिक, डाॅ. शैलेन्द्र सिंह चौहान, डाॅ. जगवीर सिंह, डाॅ. विनीत अग्निहोत्री, डा. रोहित वर्मा, मनीष वर्मा, अशेष नारायण द्विवेदी, डाॅ. सत्य देव, डाॅ. पराग अग्रवाल, संदीप श्रीवास्तव, डाॅ. अमित सोनी, डाॅ. संतोष सिंह, इं. विपिन शुक्ला, डाॅ. सुनील शुक्ला, डाॅ. राजीव निरंजन, डाॅ. प्रीति सिरौठिया, डाॅ. वर्षा साहू, डॉ. रेनू चंदेल, डाॅ. रजनी उपाध्याय, डाॅ. रिचाराज सक्सेना, श्रीमती कविता पैजवार, डाॅ. अभिलाषा साहू, सुश्री श्वेता आनन्द, डाॅ. ऊषा तिवारी, राहुल पस्तोर, अतुल मिश्रा, विवेक पाराशर, फहीम बख्श, हरीप्रसाद, ध्रुव किलेदार, राजीव गोस्वामी, दीपक रावत, जयंत चैबे, गजेन्द्र सिंह, संजय शर्मा, रमेश पाल, सुरेश पाल, हरदयाल, रामसेवक, राकेश कुमार, मिलन सेन, कमलेश कुमार, पुष्पेन्द्र तिवारी, हरि नारायण पाल, लक्ष्मीनारायण सोनी, कामता शर्मा आदि सभी सत्रों में उपस्थित रहे। संचालन डाॅ. दीपक पाठक ने किया एवं प्रो. अनिल सूर्यवंशी ने सभी का आभार जताया।

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